जानिए कब और कैसे मनाये श्री कृष्ण जन्माष्टमी……………
श्री कृष्ण जन्माष्टमी…
पूर्णिमा के बाद भादों का महीना लग गया है। भादों के महीने की षष्ठी को बलराम और अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। इस माह में भगवान विष्णु की खास पूजा करनी चाहिए।
आपको बता दें कि श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में कृष्ण जन्म प्रसंग का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि जिस समय पृथ्वी पर अर्धरात्रि में कृष्ण अवतरित हुए, उस समय ब्रज में घनघोर बादल छाए थे, लेकिन चंद्रदेव ने दिव्य दृष्टि से अपने वंशज के जन्म लेते दर्शन किए। आज भी कृष्ण जन्म के समय अर्धरात्रि में चंद्रमा उदय होता है। धर्मग्रंथ में उस समय अर्धरात्रि का वर्णन है।
“साथ नहीं है अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र”
भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। लेकिन कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है कि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों एक ही दिन नहीं होते। इस बार भी कृष्ण जन्म की तिथि और नक्षत्र एक साथ नहीं मिल रहे हैं। 11 अगस्त को सुबह 9 बजकर 07 मिनट के बाद अष्टमी तिथि आरंभ हो जाएगी, जो 12 अगस्त को 11 बजकर 17 मिनट तक रहेगी। वहीं रोहिणी नक्षत्र का आरंभ 13 अगस्त को सुबह 03 बजकर 27 मिनट से 05 बजकर 22 मिनट तक रहेगा।
जन्माष्टमी के दिन पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग है। जन्माष्टमी पर राहुकाल दोपहर 12:27 बजे से 02:06 बजे तक रहेगा। इस बार जन्माष्टमी पर कृतिका नक्षत्र रहेगा, उसके बाद रोहिणी नक्षत्र रहेगा, जो कि 13 अगस्त तक रहेगा। पूजा का शुभ समय रात 12 बजकर 05 मिनट से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक है। जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण का दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक कर पंचामृत अर्पित करना चाहिए। तथा माखन मिश्री का भोग लगाना चाहिए।
“जानिए किस दिन है कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व”
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन भगवान विष्णु के आठवें अवतार कृष्ण का जन्म हुआ था। भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था इसलिए इस तिथि का सनातन धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन लोग व्रत, पूजन और उत्सव मनाते हैं। कहीं भगवान की पालकी सजाई जाती है तो कहीं झांकी निकाली जाती है।
लेकिन इस बार जन्माष्टमी तिथि को लेकर ऐसी दुविधा है, जिससे भक्तों के अंदर असमंजस्य की स्थिति बनी हुई है। इस साल कृष्ण जन्माष्टमी 11 और 12 अगस्त दो दिन देखने को मिल रही है। हर बार की तरह इस बार भी जन्माष्टमी दो दिन मनाई जाएगी। 11 और 12 अगस्त दोनों ही दिन जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाएगा, लेकिन 12 अगस्त को जन्माष्टमी मानना श्रेष्ठ है। मथुरा और द्वारिका में 12 अगस्त को जन्मोत्सव मनाया जाएगा। ।
जानिए स्मार्त और वैष्णव में अंतर…
कृष्ण जन्माष्टमी को मनाने वाले दो अलग-अलग संप्रदाय के लोग हैं, स्मार्त एवं वैष्णव। इनके विभिन्न मतों के कारण दो तिथियां बनती हैं। स्मार्त वह भक्त होते हैं जो गृहस्थ आश्रम में रहते हैं। जिस प्रकार यह अन्य देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना और व्रत करते हैं, उसी प्रकार कृष्ण जन्माष्टमी का धूमधाम से उत्सव मनाते हैं। किन्तु जो वैष्णव भक्त होते हैं वे अपना संपूर्ण जीवन भगवान कृष्ण को अर्पित कर देते हैं। उन्होंने गुरु से दीक्षा भी ली होती है और गले में कंठी माला भी धारण करते हैं। जितने भी साधु-संत और वैरागी होते हैं, वे वैष्णव धर्म में आते हैं।
11 अगस्त को गृहस्थ आश्रम वाले रखें व्रत:
शास्त्रों में इस तरह की उलझनों के लिए एक आसान सा उपाय बता गया है कि गृहस्थों को उस दिन व्रत रखना चाहिए जिस रात को अष्टमी तिथि लग रही है। पंचांग के अनुसार, 11 अगस्त दिन मंगलवार को गृहस्थ आश्रम के लोगों के लिए जन्माष्टमी का पर्व मनाना सही रहेगा क्योंकि 11 की रात को अष्टमी है। गृहस्थ लोग रात में चंद्रमा को अर्घ्य दें, दान और जागरण कीर्तन करें तथा 12 अगस्त को व्रत का पारण करें और कृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाएं, जो कि श्रेष्ठ एवं उत्तम रहेगा।
12 अगस्त को वैष्णव धर्म वाले रखें व्रत:
जो लोग वैष्णव व साधु संत हैं वह 12 अगस्त को व्रत रख सकते हैं। 12 अगस्त को सुबह 11 बजकर 17 मिनट तक अष्टमी तिथि रहेगी और उसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी। इस दिन अष्टमी और नवमी दोनों रहेंगी। साथ ही इस दिन कृतिका नक्षत्र बन रहा है। इसी दिन कृष्ण जन्मोत्सव का पर्व मनाया जाएगा। दरअसल कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत तथा जन्मोत्सव दो अलग-अलग तिथियां हैं।
🌺🙏🙏 जय श्री कृष्णा 🙏🙏🌺




