नवरात्र में घटस्थापना एवं कलश स्थापना का विशेष महत्व है। सामान्य रूप से इसे नवरात्रि का पहला दिन माना जाता है। घटस्थापना के दिन से नवरात्रि का आरंभ होता है। नवरात्र में प्रतिपदा या प्रथमा तिथि को शुभ मुहुर्त में पूरे विधि-विधान के साथ घट स्थापना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलश को भगवान गणेश की संज्ञा दी गई है और किसी भी पूजा से पूर्व सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश की वंदना की जाती है । आइए जानते हैं इस वर्ष शारदीय नवरात्र में घटस्थापना / कलश स्थापना की तारीख़ तथा शुभ मुहूर्त।


घटस्थापना मुहूर्त :
06:16:56 से 10:11:33 तक
अवधि :
3 घंटे 54 मिनट

घटस्थापना के नियम:

● दिन के एक तिहाई हिस्से से पहले घटस्थापना की प्रक्रिया संपन्न कर लेनी चाहिए ।
● कलश स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त सबसे उत्तम माना गया है।
● घटस्थापना के लिए शुभ नक्षत्र इस प्रकार हैं: पुष्या, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, हस्ता, रेवती, रोहिणी, अश्विनी, मूल, श्रवण, धनिष्ठा और पुनर्वसु

घटस्थापना के लिए आवश्यक सामग्री:

● सप्त धान्य (7 तरह के अनाज)
● मिट्टी का एक बर्तन जिसका मुँह चौड़ा हो
● पवित्र स्थान से लाई गयी मिट्टी
● कलश, गंगाजल (उपलब्ध न हो तो सादा जल)
● पत्ते (आम या अशोक के)
● सुपारी
● जटा वाला नारियल
● अक्षत (साबुत चावल)
● लाल वस्त्र
● पुष्प (फूल)

घटस्थापना विधि:

● सर्वप्रथम मिट्टी के बर्तन में रख कर सप्त धान्य को उसमें रखें ।
● अब एक कलश में जल भरें और उसके ऊपरी भाग (गर्दन) में कलावा बाँधकर उसे उस मिट्टी के पात्र पर रखें ।
● अब कलश के ऊपर अशोक अथवा आम के पत्ते रखें ।
● अब नारियल में कलावा लपेट लें ।
● इसके उपरान्त नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर कलश के ऊपर और पल्लव के बीच में रखें ।
● घटस्थापना पूर्ण होने के बाद देवी का आह्वान करें ।

पूजा संकल्प मंत्र:
नवरात्र में 9 दिनों तक व्रत रखने वाले देवी माँ के भक्तों को निम्नलिखित मंत्र के साथ पूजा का संकल्प करना चाहिए:

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्राह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे, अमुकनामसम्वत्सरे
आश्विनशुक्लप्रतिपदे अमुकवासरे प्रारभमाणे नवरात्रपर्वणि एतासु नवतिथिषु
अखिलपापक्षयपूर्वक-श्रुति-स्मृत्युक्त-पुण्यसमवेत-सर्वसुखोपलब्धये संयमादिनियमान् दृढ़ं पालयन् अमुकगोत्रः
अमुकनामाहं भगवत्याः दुर्गायाः प्रसादाय व्रतं विधास्ये।

नोट: ध्यान रखें, मंत्र का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए। इस मंत्र में कई जगह अमुक शब्द आया है। जैसे- अमुकनामसम्वत्सरे, यहाँ पर आप अमुक की जगह संवत्सर का नाम उच्चारित करेंगे। यदि संवत्सर का नाम सौम्य है तो इसका उच्चारण सौम्यनामसम्वत्सरे होगा। ठीक ऐसे ही अमुकवासरे में उस दिन का नाम, अमुकगोत्रः में अपने गोत्र का नाम और अमुकनामाहं में अपना नाम उच्चारित करें।

यदि नवरात्र के पहले, दूसरे, तीसरे आदि दिनों के लिए उपवास रखा जाए, तो ऐसी स्थिति में ‘एतासु नवतिथिषु’ की जगह उस तिथि के नाम के साथ संकल्प किया जाएगा जिस तिथि को उपवास रखा जा रहा है। जैसे – यदि सातवें दिन का संकल्प करना है, तो मंत्र इस प्रकार होगा:

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्राह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे,
अमुकनामसम्वत्सरे आश्विनशुक्लप्रतिपदे अमुकवासरे प्रारभमाणे नवरात्रपर्वणि सप्तम्यां तिथौ
अखिलपापक्षयपूर्वक-श्रुति-स्मृत्युक्त-पुण्यसमवेत-सर्वसुखोपलब्धये संयमादिनियमान् दृढ़ं पालयन्
अमुकगोत्रः अमुकनामाहं भगवत्याः दुर्गायाः प्रसादाय व्रतं विधास्ये।

ऐसे ही अष्टमी तिथि के लिए सप्तम्यां की जगह अष्टम्यां का उच्चारण होगा।

षोडशोपचार पूजा के लिए संकल्प:
यदि नवरात्रि के दौरान षोडशोपचार पूजा करना हो तो नीचे दिए गए मंत्र से प्रतिदिन पूजा का संकल्प करें:

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्राह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे, अमुकनामसम्वत्सरे
आश्विनशुक्लप्रतिपदे अमुकवासरे नवरात्रपर्वणि अखिलपापक्षयपूर्वकश्रुति-स्मृत्युक्त-पुण्यसमवेत-सर्वसुखोपलब्धये अमुकगोत्रः
अमुकनामाहं भगवत्याः दुर्गायाः षोडशोपचार-पूजनं विधास्ये।

ll धन्यवाद ll
ll प्रेम से बोलो जगत जननी मां दुर्गा की जय ll